Monday, 9 May 2011

1० मई को प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की वर्षगाठ मनाया जाना चाहिए 1० मई को प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की वर्षगाठ मनाया जाना चाहिए ........................इसे राष्ट्रीय दिवस घोषित किया जाना चाहिए ................... . वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में इसकी प्रासंगिकता को भी समझा जाना चाहिए 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 10 मई 1857 से शुरू हुआ था |इसकी शुरुआत सैन्य विद्रोह के रूप में मेरठ छावनी से हुई थी |मुख्यत: अंग्रेजी राज की हड्पो नीति के विरुद्ध खड़े हुए देशी रजवाडो से लेकर ब्रिटिश राज में प्रताड़ना ,भेदभाव आदि की विरुद्ध बगावत पर उतर आये सैनिको ,बेदखली का दंश झेल रहे तालुकेदारो व् किसानो ने युद्ध को आगे बढ़ाया | उत्तर ,पूर्व एवं मध्य भारत के खासे बड़े हिस्से में खासकर अवध ,आगरा (वर्तमान उत्तर प्रदेश )के क्षेत्र में बिहार के पश्चिमी तथा मध्य प्रदेश के खासे बड़े क्षेत्र की बड़ी आबादी को ब्रिटिश राज के विरुद्ध युद्ध में उतार दिया था |फिर इस युद्ध में पुरे क्षेत्र के हिन्दुओं -मुसलमानों ने तमाम धार्मिक ,सामाजिक एवं सास्कृतिक दूरियों के वावजूद एक अभूतपूर्व राजनीतिक एकता भी स्थापित कर दिया था |दोनों धार्मिक समुदायों को उनके धार्मिक लीडरो को ब्रिटिश राज के विरुद्ध युद्ध में एक साथ खड़ा कर दिया था सदियों से जड बने और सुप्त पड़े इस क्षेत्र को जगाकर युद्ध में उतार देने का श्रेय 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम दर्ज़ हैं |हिन्दू -मुस्लिम समुदाय को तथा रियासतदारो ,जागीरदारों के समुदाय को किसानो -दस्तकारो के समुदाय को तथा खासे बड़े सैन्य समुदाय को ,अंग्रेजी राज को हटाने -मिटने के लक्ष्य से एक साथ खड़ा कर देने का श्रेय नि :संदेह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष को हैं | यह युद्ध देश व्यापी नही था |बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तथा राजस्थान व् पंजाब का खासा हिस्सा इससे अप्रभावित था |इसके बावजूद आधुनिक राष्ट्र के रूप में खड़े हो रहे हिंदुस्तान का स्वतंत्रता संघर्ष था | इसका सबसे बड़ा सबूत तो यह है की इसने पुरे देश पर प्रभुत्व जमाए और पुरे देश का शोषण ,लुट करती- करवाती ब्रिटिश सत्ता -सरकार को उखाड़ देने का प्रयास किया था |विदेशी राज और व्यापार के साथ ,विदेशी धर्म ,संस्कृति को भी जड से उखाड़ देने का प्रयास किया था |बेशक १८५७ख़ युद्ध में शामिल हुए विभिन्न वर्गो के लोगो के हित एक जैसे नही थे |अलग -अलग और परस्पर विरोधी भी थे |परन्तु उनमे एकजुटता और समर्थन का आधार विदेशी शासन सत्ता को उखाड़ फेकने में जरुर निहित था .. अंग्रेजी राजके विरुद्ध विद्रोह १८५७श्र पहले भी होतेराहे थे |१७५७मेन् कम्पनी राज की स्थपना के बाद १७७० में हुए सन्यासी विद्रोह से लेकर १८५६ तक चले संथाल विद्रोह के बीच विभिन्न क्षेत्रो से उठने वाले धार्मिक व् क्षेत्रीय विद्रोहों की एक पूरी श्रृखला मौजूद है | यह कहना एकदम ठीक है कि ,१८५७ का संग्राम इन सरे विद्रोहों ,युधो कि एक अगली कड़ी थी और उनकी चरम परिणिति भी | नि :संदेहइन सरे विद्रोहों और १८५७ के महाविद्रोहो के कारण ब्रिटिश हुकूमत तथा ब्रिटिश व्यापारी द्वारा देश के शोषण ,लुट व् प्रुभुत्व में ,देशवासियों पर ढाये जा रहे अन्याय अत्याचार में तथा नस्ली व् धार्मिक उत्पीडन आदि में निहित था |१० मई १८५७ख़ शुरू हुआ यह महाविद्रोह सबसे पहले मेरठ छावनी के सैन्य विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ |इसका तात्कालिक कारण मेरठ छावनी के ८९ सैनिको द्वारा गायव् सूअर कि चर्बी वाले कारतूसो के इस्तेमाल करने से साफ़ तौर पर मना किया जाना था |इन सैनिको के कोर्टमार्शल के बाद मेरठ छावनी से उठे इस विद्रोह ने अलगे दिन ही अंग्रेजो से दिल्ली कि हुकमत छीनकर उसे उसके पुराने व् अंतिम मुगलिया वारिश बहादुर शाह जफर के हाथो में दे दिया |फिर तो इस विद्रोह ने साल भर से उपर चले ,महायुद्ध का रूप ले लिया |भयानक खून -खराबे ,कत्लो -गारत ,जुलम -अत्याचार ,वफादारी -गद्दारी का एक अलग व् अभूतपूर्व इतिहास बना |निहायत संगठित और आधुनिक अस्त्र शस्त्र से लैश तथा उसके देशी हिमायतियो के भरपूर सहयोग के वावजूद अंग्रेजी फ़ौज को कई बार भारी पराजय का सामना करना पड़ा | लेकिन अंतत: १८५७ख़ इस महा विद्रोह को पराजित होना पड़ा |। भले ही १८५७ का विद्रोह सैन्य युद्ध में पराजित हो गया ,लेकिन उसने यहा के प्रतिकार शून्य समाज को ब्रिटिश सत्ता के मुकाबले में हमेशा के लिए खड़ा कर दिया |देशवासियों में रास्ट्र के प्रबुद्ध हिस्सों में आधुनिक युग के राष्ट्रवाद की भावनाओं को जगा दिया |राष्ट्र प्रेम व् राष्ट्रवाद के बीजो को अंकुरित कर दिया |बाद के दौर में इस राष्ट्र प्रेम के इन अंकुरित बीजो को राष्ट्रवादियो व् कार्न्तिकरियो ने ,गदर पार्टी के रूप से सीचकर राष्ट्रवाद के वृक्ष में बदल दिया |यदि राष्ट्रीयता के विकास के दृष्टि से इसे देखा जाए तो १८५७ख़ युद्ध में हमे पराजय के बदले राष्ट्रवाद का पनपता ,फैलता वृक्ष भी मिला | लेकिन १९२० -२१ के बाद ब्रिटिश कम्पनियों के साथ हिन्दुस्तानी कम्पनियों की बदती साठ-गाठव् सहयोग ने और फिर उसी अनुसार राजनीति में ब्रिटिश हुकमत और कांग्रेस के बीच होते रहे समझोते ने १८५७ के महत्व को धूमिल कर दिया |उसे महज इतिहास का विषय बना दिया |इसके दो तथ्यगत सबूतों को आप देख व् समझ सकते है | पहले सबूत है ,मार्च १९२९ में गाँधी जी की लिखी भूमिका के साथ प्रकाशित हुई ,सुदरलाल की पुस्तक "भारत में अंग्रेजी राज "|इस पुस्तक में १८५७ के संघर्ष तक के इतिहास को ही विषय बनाया गया है | इस पुस्तक के अन्तिम पृष्ठ पर संदेश दिया गया है कि-"हमारी अन्तिम सफलता की कुंजी यह है कि हम किसी भी कदम पर जीवन के सर्वोच्च आदर्श ,अहिंसा से डगमगाए नही |.....स्वाभाविक तौर पर यह संदेश ,१८५७ के स्वतंत्रता समर को बीते युग कि घटना के रूप में ही समाप्त कर देने का सन्देश है |कयोकियह १८५७ के घोर हिंसात्मक युद्ध के विपरीत अहिंसा के रस्ते पर चलने कि ताकीद करता है |इसीलिए इस पुस्तक पर लगा प्रतिबन्ध भी १९३७ में अंग्रेजी राज द्वारा हटा लिया गया |गाँधी जी एवं एनी कांग्रेसी लीडरो द्वारा इसे हटाने के लिए भारी प्रयास भी किया गया | जबकि विनायक दामोदर सावरकर कि लन्दन में लिखी किताब "१८५७ का प्रथम स्वतंत्रता समर " पर उसी समय से लगा प्रतिबन्ध व् जप्ती जारी रही |उसे १९४७ के बाद ही हटाया गया | दूसरा सबूत १८५७ में कांग्रेस की केन्द्रीय सरकार में शिक्षा मंत्री और प्रसिद्ध कांग्रेसी स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम द्वारा इतिहासकार एस .एन सेन की किताब "एट्टींन फिफ्टीन सेवन " की भूमिका में मौजूद है |उन्होंने स्पष्ट लिखा है की "१०० साल पहले के इतिहास में घटित युद्ध से राजनितिक प्रेरणा लेने का समय बीत चूका है |भारत और ब्रिटिश के बीच की राजनितिक समस्या को आपसी बात -चीतव् समझौते से सुलझा लिया गया है |......... भारत ब्रिटिश सम्बन्धो में बीते काल की कडवाहट अब नही रही |................ जाहिर सी बात है की ,यह विचार केवल श्री मौलाना आजाद के नही है ,बल्कि १९४७ में भारत -पाकिस्तान विभाजन के बाद सत्ता सरकार में छड़ी कांग्रेसी सरकार और लीग सरकार के भी है |कयोकि उन्होंने १८५७ में ब्रिटिश राज ,व्यापार ,संस्कृति आदि के विरुद्ध संघर्षो के रास्ते का पूरी तरह परित्याग कर दिया था |१८५७ ने युद्ध के बाद खड़े हुए राष्ट्रवाद के वृक्ष को १९२०-२१ के बाद से काट -छाट कर छिन्न-भिन्न कर देने का ही काम किया था | इस दौर में हिन्दुस्तानी धनाड्य तबको एवं धनाड्य कम्पनियों द्वारा ब्रिटिश कम्पनियों और ब्रिटिश राज के साथ पूंजी ,तकनीक वाणिज्य ,व्यापार के साथ के साथ होते समझौते भी संघर्षशील राष्ट्रवाद के इस वृक्ष को पूरा काटकर धराशायी कर दिया |राष्ट्रवाद के लिए हुए संघर्ष को ,राज को लुटने -पाटने के समझौते में बदल दिया गया |स्वतंत्रता के इस समझौते के अंतर्गत ब्रिटिश औधोगिक ,व्यापारिक एवं महाजनी कम्पनियों द्वारा तथा सामार्ज्यी ताकतों द्वारा इस देश का शोषण व् लुट करने और इसे अपने ऊपर निर्भर बनाते जाने का काम आगे बढ़ाया जाता रहा |वह भी इस देश की धनाड्य कम्पनियों सरकारों एवं उच्च तबको के साथ साठ -गाठ व् सहयोग से | आज वही सहयोग १९८०-८५ के बाद की विश्वीकरण नीतियों के रूप में हमारे सामने है | बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा पिछले २० सालो में देश के केन्द्रीय व् प्रांतीय सरकारों से हर तरह की छुट व् अधिकार लिए जाते रहे है |उनकी लुट को खुलेआम बढ़ाया जाता रहा है | देश पर विदेशी खासकर अमेरिकी प्रभुत्व को स्पष्ट रूप से बढ़ाया जाता रहा | इन्ही समझौतों ,सम्बन्धो नीतियों ,प्रस्तावों के फलस्वरूप देश के धनाड्य एवं उच्च वर्गो की ऊँचाइया बढती रही है |साधारण मजदूरों ,किसानो ,छोटे कारोबारियों एवं अन्य निम्न मध्यम वर्गियो की रोजी रोटी का संकट भी तेजी से बढ़ता जा रहा है |इसलिए इस देश के जनसाधारण के लिए विदेशी व्यापार ,विदेशी प्रभुत्व ,विदेशी संस्कृति के खिलाफ लड़ा1857 का युद्ध केवल इतिहास नही है |वह आज भी ढ़ते औसाम्राज्यी ताकतों के बधोगिक ,व्यापारिक ,वित्तीय लूट व् प्रभुत्व के विरोध के लिए प्रासगिक है प्रेरणादायक है |इसीलिए देश के जनसाधारण में १० मई के रूप में १८५७ को मनाने और उससे आज के संघर्षो के लिए मार्ग दर्शन लेने की जरूरत है |....... .......सुनील दत्ता 09415370672


Monday, 11 April 2011

अपसंस्कृति


दुनिया की आप़ा धापी में शामिल लोग
भूल चुके है अलाव की संस्कृति
नहीं रहा अब बुजुर्गों की मर्यादा का ख्याल
उलझे धागे की तरह नहीं सुलझाई जाती समस्याएं
संस्कृति , संस्कार ,परम्पराओं की मिठास को
मुंह चिढाने लगी हैं अपसंस्कृति की आधुनिक बालाएं
अब वसंत कहाँ ?
कहां ग़ुम हो गयीं खुशबू भरी जीवन की मादकता
उजड़ते गावं -दरकते शहर के बीच
उग आई हैं चौपालों की जगह चट्टियां
जहाँ की जाती ही व्यूह रचना
थिरकती हैं षड्यंत्रों की बारूद
फेकें जाते हैं सियासत के पासे
भभक उठती हैं दारू की गंध -और हवाओं में तैरने लगती हैं युवा पीढ़ी
गूँज उठती हैं पिस्टल और बम की डरावनी आवाज़
सहमी-सहमी उदासी पसर जाती हैं
गावं की गलियों ,खलिहानों और खेतों की छाती पर
यह अपसंस्कृति का समय हैं |

-सुनील दत्ता
मोबाइल- 09415370672

नये विचारों की रोशनी में


संघर्ष
देखा है मैंने तुम्हें
ताने सुनते/जीवन पर रोते
देखा है मैंने तुम्हे सांसों-सांसों पर घिसटते
नये रूप / नये अंदाज में
देखा है मैंने तुम्हें
पल-पल संघर्ष में उतरते
मानो कह रही हो तुम
बस - बस -बस
अब बहुत हो चुका ?
सहेंगे अत्याचार, सुनेंगे ताने
हर जुल्म का करेंगे प्रतिकार
नये विचारों की रोशनी में।

-सुनील दत्ता

Saturday, 9 April 2011

जन्मदिन विशेष : महापंडित राहुल सांकृत्यायन

राहुल जी का समग्र जीवन ही रचनाधर्मिता की यात्रा थी। जहाँ भी वे गए वहाँ की भाषा व बोलियों को सीखा और इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज व साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया। राहुल सांकृत्यायन उस दौर की उपज थे जब ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे। वह दौर समाज सुधारकों का था एवं काग्रेस अभी शैशवावस्था में थी। इन सब से राहुल अप्रभावित न रह सके एवं अपनी जिज्ञासु व घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी सन्यासी से लेकर वेदान्ती, आर्यसमाजी व किसान नेता एवं बौद्ध भिक्षु से लेकर साम्यवादी चिन्तक तक का लम्बा सफर तय किया। सन् १९३० में श्रीलंका जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये एवं तभी से वे ‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ हो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाये। उनकी अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी एवं इस प्रकार वे केदारनाथ पाण्डे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। सन् १९३७ में रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में उन्होंने संस्कृत अध्यापक की नौकरी कर ली और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली, जिससे उन्हें इगोर राहुलोविच नामक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल ने उपन्यास, निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण व जीवनी आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया परन्तु अधिकांश साहित्य हिन्दी में ही रचा। राहुल तथ्यान्वेषी व जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे सो उन्होंने हर धर्म के ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। अपनी दक्षिण भारत
यात्रा के दौरान संस्कृत-ग्रन्थों, तिब्बत प्रवास के दौरान पालि-ग्रन्थों तो लाहौर यात्रा के दौरान अरबी भाषा सीखकर इस्लामी धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन किया। निश्चितत: राहुल सांकृत्यायन की मेधा को साहित्य, अध्यात्म, ज्योतिष, विज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा, संस्कृति, धर्म एवं दर्शन के टुकड़ों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता वरन् समग्रतः ही देखना उचित है।

बौद्ध -धर्म की ओर झुकाव

महापंडित राहुल सांकृत्यायन
१९१६ तक आते-आते इनका झुकाव बौद्ध -धर्म की ओर होता गया। बौद्ध धर्म में दीक्षा लेकर , वे राहुल सांकृत्यायन बने । बौद्ध धर्म में लगाव के कारण ही ये पाली,प्राकृत ,अपभ्रंश ,आदि भाषाओ के सीखने की ओर झुके ।१९१७ की रुसी क्रांति ने राहुल जी के मन को गहरे में प्रभावित किया। वे अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव भी रहे। उन्होंने तिब्बत की चार बार यात्रा की और वहा से विपुल साहित्य ले कर आए। १९३२ को राहुल जी यूरोप की यात्रा पर गए। १९३५ में जापान, कोरिया, मंचूरिया की यात्रा की। १९३७ में मास्को में यात्रा के समय भारतीय-तिब्बत विभाग की सचिव लोला येलेना से इनका प्रेम हो गया। और वे वही विवाह कर के रूस में ही रहने लगे। लेकिन किसी कारण से वे १९४८ में भारत लौट आए।
राहुल जी को हिन्दीऔर हिमालय से बड़ा प्रेम था। वे १९५० में नैनीताल में अपना आवास बना कर रहने लगे। यहाँ पर उनका विवाह कमला सांकृत्यायन से हुआ। इसके कुछ बर्षो बाद वे दार्जिलिंग(पश्चिम बंगाल) में जाकर रहने लगे ,लेकिन बाद में उन्हें मधुमेह से पीड़ित होने के कारण रूस में इलाज कराने के लिए भेजा गया। १९६३ में सोवियत रूस में लगभग सात महीनो के इलाज के बाद भी उनका स्वास्थ्य ठीक नही हुआ। १४ अप्रैल १९६३ को उनका दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में देहांत हो गया

साहित्यिक रुझान

राहुल जी वास्तव के ज्ञान के लिए गहरे असंतोष में थे, इसी असंतोष को पूरा करने के लिए वे हमेशा तत्पर रहे। उन्होंने हिन्दी साहित्य को विपुल भण्डार दिया। उन्होंने मात्र हिन्दी साहित्य के लिए ही नही बल्कि वे भारत के कई अन्य क्षेत्रों के लिए भी उन्होंने शोध कार्य किया । वे वास्तव में महापंडित थे। राहुल जी की प्रतिभा बहुमुखी थी और वे संपन्न विचारक थे। धर्म ,दर्शन ,लोकसाहित्य ,यात्रासहित्य ,इतिहास ,राजनीति, जीवनी, कोष, प्राचीन ग्रंथो का संपादन कर उन्होंने विविध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी रचनाओ में प्राचीन के प्रति आस्था,इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल राहुल जी थे,जिन्होंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिंतन को पूर्ण रूप से आत्मसात् कर मौलिक दृष्टि देने का प्रयास किया। उनके उपन्यास और कहानियाँ बिल्कुल नए दृष्टिकोण को हमारे सामने रखते हैं। तिब्बत और चीन के यात्रा काल में उन्होंने हजारों ग्रंथों का उद्धार किया और उनके सम्पादन और प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त किया, ये ग्रन्थ पटना संग्रहालय में है। यात्रा साहित्य में महत्वपूर्ण लेखक राहुल जी रहे है । उनके यात्रा वृतांत में यात्रा में आने वाली कठिनाइयों के साथ उस जगह की प्राकृतिक सम्पदा ,उसका आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन और इतिहास अन्वेषण का तत्व समाहित होता है। "किन्नर देश की ओर" ,"कुमाऊ" ,"दार्जिलिंग परिचय" तथा "यात्रा के पन्ने" उनके ऐसे ही ग्रन्थ है।

फोटो में बाएँ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, दायें महापंडित राहुल सांकृत्यायन।
राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है। उन्होंने कहा भी था कि- "कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।" राहुल ने अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात् करते हुए ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ भी रचा। वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वह बागी हो गया। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। वेदान्त के अध्ययन के पश्चात जब उन्होंने मंदिरों में बलि चढ़ाने की परम्परा के विरूद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के सनातनी पुरोहित उन पर लाठी लेकर टूट पड़े। बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद वह इसके ‘पुनर्जन्मवाद’ को नहीं स्वीकार पाए। बाद में जब वे मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुए तो उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में घुसे सत्तालोलुप सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की और उन्हें आन्दोलन के नष्ट होने का कारण बताया। सन् १९४७ में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छपे भाषण को बोलने से मना कर दिया एवं जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजन पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा, पर उनके तेवर फिर भी नहीं बदले। इस कालावधि में वे किसी बंदिश से परे प्रगतिशील लेखन के सरोकारों और तत्कालीन प्रश्नों से लगातार जुड़े रहे। इस बीच मार्क्सवादी विचारधारा को उन्होंने भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर दिया। अपनी पुस्तक ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ एवं ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में इस सम्बन्ध में उन्होंने सम्यक् प्रकाश डाला। अन्तत: सन् १९५३-५४ के दौरान पुन: एक बार वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनाये गये।
एक कर्मयोगी योद्धा की तरह राहुल सांकृत्यायन ने बिहार के किसान-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। सन् १९४० के दौरान किसान-आन्दोलन के सिलसिले में उन्हें एक वर्ष की जेल हुई तो देवली कैम्प के इस जेल-प्रवास के दौरान उन्होंने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ ग्रन्थ की रचना कर डाली। १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन के पश्चात् जेल से निकलने पर किसान आन्दोलन के उस समय के शीर्ष नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्र ‘हुंकार’ का उन्हें सम्पादक बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतु ‘गुण्डों से लड़िए’ शीर्षक से एक विज्ञापन जारी किया। इसमें एक व्यक्ति गाँधी टोपी व जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था। राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इन्कार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानन्द ने इसे छापने पर जोर दिया। अन्तत: राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन से ही अलग कर लिया। इसी प्रकार सन् १९४० में ‘बिहार प्रान्तीय किसान सभा’ के अध्यक्ष रूप में जमींदारों के आतंक की परवाह किए बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतर हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे। प्रतिरोध स्वरूप जमींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार कर लहुलुहान कर दिया पर वे हिम्मत नहीं हारे। इसी तरह न जाने कितनी बार उन्होंने जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया और अपनी आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी।
अध्ययन-अनुसंधान की विभा के साथ वे वहाँ से प्रभूत सामग्री लेकर लौटे, जिसके कारण हिन्दी भाषा एवं साहित्य की इतिहास संबंधी कई पूर्व निर्धारित मान्यताओं एवं निष्कर्षों में परिवर्तन होना अनिवार्य हो गया। साथ ही शोध एवं अध्ययन के नए क्षितिज खुले।
भारत के संदर्भ में उनका यह काम किसी ह्वेनसांग से कम नहीं आँका जा सकता। बाह्य यात्राओं की तरह इन निबंधों में उनकी एक वैचारिक यात्रा की ओर भी संकेत किया गया है, जो पारिवारिक स्तर पर स्वीकृत वैष्णव मत से शुरू हो, आर्य समाज एवं बौद्ध मतवाद से गुजरती हुई मार्क्सवाद पर जाकर खत्म होती है। अनात्मवाद, बुद्ध का जनतंत्र में विश्वास तथा व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध जैसी कुछेक ऐसी समान बातें हैं, जिनके कारण वे बौद्ध दर्शन एवं मार्क्सवाद दोनों को साथ लेकर चले थे।
राष्ट्र के लिए एक राष्ट्र भाषा के वे प्रबल हिमायती थे। बिना भाषा के राष्ट्र गूँगा है, ऐसा उनका मानना था। वे राष्ट्रभाषा तथा जनपदीय भाषाओं के विकास व उन्नति में किसी प्रकार का विरोध नहीं देखते थे।
समय का प्रताप कहें या 'मार्क्सवादी के रूप में उनके मरने की इच्छा' कहें, उन्होंने इस आयातित विचार को सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान 'परमब्रह्म' मान लिया और इस झोंक में वे भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, इतिहास आदि के बारे में कुछ ऐसी बातें कह बैठे या निष्कर्ष निकाल बैठे, जो उनकी आलोचना का कारण बने।
उनकी भारत की जातीय-संस्कृति संबंधी मान्यता, उर्दू को हिन्दी (खड़ी बोली हिन्दी) से अलग मानने का विचार तथा आर्यों से 'वोल्गा से गंगा' की ओर कराई गई यात्रा के पीछे रहने वाली उनकी धारणा का डॉक्टर रामविलास शर्मा ने तर्कसम्मत खंडन किया है। मत-मतांतर तो चलते रहते हैं, इससे राहुलजी का प्रदेय और महत्व कम नहीं हो जाता।
बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद दोनों का मिलाजुला चिंतन उनके पास था, जिसके आधार पर उन्होंने नए भारत के निर्माण का 'मधुर स्वप्न' सँजोया था, जिसकी झलक हमें उनकी पुस्तक 'बाईसवीं सदी' में भी मिल जाती है। श्री राहुल ने अपने कर्तृत्व से हमें अपनी विरासत का दर्शन कराया तथा उसके प्रति हम सबमें गौरव का भाव जगाया।
उनके शब्दों में- ‘‘समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसके हरेक बर्ताव का सार।’’ यही कारण था कि सारे संसार को अपना घर समझने वाले राहुल सन् १९१० में घर छोड़ने के पश्चात पुन: सन् १९४३ में ही अपने ननिहाल पन्दहा पहुँचे। वस्तुत: बचपन में अपने घुमक्कड़ी स्वभाव के कारण पिताजी से मिली डाँट के पश्चात् उन्होंने प्रण लिया था कि वे अपनी उम्र के पचासवें वर्ष में ही घर में कदम रखेंगे। चूँकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा ननिहाल में ही हुआ था सो ननिहाल के प्रति ज्यादा स्नेह स्वाभाविक था। बहरहाल जब वे पन्दहा पहुँचे तो कोई उन्हें पहचान न सका पर अन्तत: लोहार नामक एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें पहचाना और स्नेहासक्ति रूधे कण्ठ से ‘कुलवन्ती के पूत केदार’ कहकर राहुल को अपनी बाँहों में भर लिया। अपनी जन्मभूमि पर एक बुजुर्ग की परिचित आवाज ने राहुल को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी डायरी में इसका उल्लेख भी किया है- ‘‘लाहौर नाना ने जब यह कहा कि ‘अरे ई जब भागत जाय त भगइया गिरत जाय’ तब मेरे सामने अपना बचपन नाचने लगा। उन दिनों गाँव के बच्चे छोटी पतली धोती भगई पहना करते थे। गाँववासी बड़े बुजुर्गों का यह भाव देखकर मुझे महसूस होने लगा कि तुलसी बाबा ने यह झूठ कहा है कि- "तुलसी तहाँ न जाइये, जहाँ जन्म को ठाँव, भाव भगति को मरम न जाने धरे पाछिलो नाँव।।’’
घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो अप्रैल १९६३ में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और १४ अप्रैल, १९६३ को सत्तर वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।
राहुल बाबा
राहुल जी घुमक्कड़ी के बारे मे कहते हैं:
मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दुख में हो चाहे सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़–फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया। जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव–वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहायी है, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हरगिज नहीं चाहेंगे कि वे खून के रास्ते को पकड़ें। किन्तु घुमक्कड़ों के काफले न आते जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।

प्रस्तुति:
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

Sunday, 3 April 2011

भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलनों को संगठित किया जाना जरूरी है

वर्तमान दौर का भूमि अधिग्रहण मुख्यत: निजी क्षेत्र कि व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कम्पनियों के लिए किया बढ़ाया जा रहा है | किसान को जमीन से ,ग्रामीणों को गावं से उजाड़ा व् विस्थापित किया जा रहा है |कम्पनियों को मालिकाने के साथ स्थापित किया जा रहा है |कम्पनियों के स्वार्थ पूर्ति के लिए कृषि भूमि को हडपने की यह नीति डलहौजी की ह्ड्पो नीति से भी ज्यादा गम्भीर खतरनाक एवं व्यापक है।
कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल के सिंगुर और नंदी ग्राम के किसानो की भूमि का अधिग्रहण ,देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ था |पश्चिम बंगाल की सरकार सिंगूर में टाटा मोटर्स के लिए तथा नंदी ग्राम में एक इंडोनेशिया कम्पनी के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण कर रही थी | उसे बंगाल के आधुनिक औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक बता रही थी |उस अधिग्रहण का व्यापक विरोध हुआ |इसी फलस्वरूप टाटा साहब को अपनी लखटकिया कार का कारखाना गुजरात ले जाना पड़ा |
औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों के हितो में कृषि भूमि का वर्तमान दौर में अधिग्रहण देश के हर प्रान्त में हर क्षेत्र में किया जा रहा है |देश की केन्द्रीय व् प्रांतीय सरकारे पिछले १०-१५ सालो से अधिग्रहण की प्रक्रिया को तेजी के साथ आगे बढाती जा रही है |सत्ता -सरकार में आती जाती रहने वाली सभी राजनीतिक पार्टिया यह काम करती रही है |यह बात दूसरी है की सत्ता से बाहर होने के बाद वे भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानो का साथ देती दिखाई पड़ जाती है |लेकिन असलियत यह है कि वे भूमि अधिग्रहण का विरोध नही करती बल्कि अधिग्रहण के लिए ज्यादा मुआवजा न देने के लिए सत्तासीन पार्टी के विरोध की राजनीति करती है |फिर सत्ता -सरकार में आने पर अधिग्रहण की उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में लग जाती है |
वतमान दौर में भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक एवं औद्योगिक विकास के लिए तथा सशक्त रास्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक बताया जा रहा है |देश में बुनियादी ढाचे के विकास के नाम पर ,४ ,६ , ८ लेन की सडको के लिए भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है |फिर इस सडको के किनारे व्यापारिक प्रतिष्ठानों .आधुनिक आवासों तथा मनोरंजन स्थलों आदि से सुसज्जित टाउनशिप के निर्माण के लिए भी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है |इसके अलवा विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (सेज ) के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण तो १० - १५ साल पहले से ही किया जा रहा है |बताने की जरूरत नही कि,टाउनशिप और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण घोषित और एकदम नग्न रूप में कम्पनियों के हित में किया जा रहा अधिग्रहण है |
इसके अलावा अधिग्रहीत भूमि पर बन रही एक्सप्रेस वे नाम की सडको के निर्माण का ठेका भी बड़ी कम्पनियों के पास ही है |
फिर उन सडको का प्रमुखता से इस्तेमाल भी भारी एवं तेज गति के वाहनों के मालिक व् सेवक ही कर रहे है |फुटपाथियो ,स्किल स्वरों आदि के लिए उसका इस्तेमाल कर पाने की गुंजाइश ही बहुत कम है साफ़ बात है कि सडक निर्माण से लेकर उसके इस्तेमाल तक का सबसे बड़ा लाभ कम्पनियों को ही मिलना है और मिल भी रहा है |
देश के आधुनिक विकास के लिए जमीनों का अधिग्रहण पहले भी किया जाता रहा है |लेकिन २०-२५ साल पहले के भूमि अधिग्रहण में न तो आज जैसी तेजी थी और न ही उसे इतने व्यापक स्तर पर चलाया और बढाया ही जा रहा था फिर उस दौर में गैर कृषिक कार्यो के लिए कृषि भूमि का अधि ग्रहण कम से कम किये जाने की नीति भी आमतौर पर अपनाई व लागू की जा रही थी |इसके अलावा उस दौर के भूमि अधिग्रहण और वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण में एक और भी प्रमुख अन्तरहै |वह यह कि सरकारों द्वारा पहले का भूमि अधिग्रहण मुख्यत: सार्वजनिक कार्यो के लिए ,प्रत्यक्ष रूप में नजर आने वाले जनहित व जनसेवा के कार्यो के लिए किया जा रहा था |परन्तु १९८५ -९० के बाद यह अधिग्रहण मुख्यत:निजी क्षेत्र के औद्योगिक ,व्यापारिक ,कम्पनियों के लिए किया जा रहा है उन्ही के दिशा -निदेश के अनुसार बुनियादी ढाचे का कई लेन कई सडको आदि का विकास विस्तार किया जा रहा है |यह बात दूसरी है कई देशी व विदेशी कम्पनियों के निजी हितो ,स्वार्थो को भी अब सत्ता -सरकार से लेकर प्रचार माध्यमो तक में रास्ट्रीय -हित सावर्जनिक -हित कहा जाने लगा है |इसी तरह से किसानो द्वारा अधिग्रहण का विरोध भी बताया व् प्रचारित किया जा रहा है |जमीने बचाने के लिए किये जा रहे उनके न्याय संगत विरोध व् आन्दोलन को मुख्यत: ज्यादा मुआवजे के लिए किया जा रहा प्रचारित कर उसे कमजोर करने और तोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है
इन्ही प्रचारों के साथ वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण को बढ़ाया जा रहा है |किसानो को जमीनों ,ग्रामवासियों को गाँवो से उजाड़ा व् विस्थापित किया जा रहा है |देशी -विदेशी औद्योगिक ,व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कम्पनियों को जमीन का मालिकाना देने के साथ स्थापित किया जा रहा है |उनके सेवको को आधुनिक साधनों -सुविधाओ के साथ आवासित किया जा रहा है |उसके लिए सरकारे उन्हें हर तरह की छूटे -सुविधाए दी जा रही है |
कम्पनी हित में कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण का दूसरा व अहम पहलू यह भी है की बढ़ते अधिग्रहण के साथ अराजक रूप से बढ़ते शहरीकरण के साथ कृषि भूमि के रकबे में हो रही कमी को उपेक्षित किया जा रहा है |सरकारों द्वारा खाद्यान्नों के उत्पादन वृद्धि दर में आ रही कमी की स्वीकारोक्ति तथा खाद्यान्नों की बढती महंगाई के बावजूद यह उपेक्षा की व बढाई जा रही है |
औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों के बढ़ते लाभों के चलते खेती के बढ़ते रहे संकटो के साथ अब उद्योग व्यापर के बड़े मालिको के स्वार्थपूर्ति के लिए कृषि भूमि को हडपने की नीति अपनाई व लागु की जा रही है |वर्तमान दौर की यह' भूमि हड्पो नीति 'डलहौजी नीति से कंही ज्यादा खतरनाक एवं व्यापक है |यह केवल किसानो का ग्रामवासियों का विस्थापन ही नही बल्कि राष्ट्र की आम जनता को खाद्यान्नों के अभाव में महगाई में और ज्यादा फंसाना भी हैं ,उन्हें भुखमरी झेलने के लिए मजबूर करना भी है|
लिहाज़ा कम्पनी कम्पनी हित में चलाये बढाये जा रहे कृषि भूमि के अधिग्रहण का विरोध किये जाने की आवश्यकता है |
देश -प्रदेश में जगह -जगह किसानो के अधिग्रहण के विरोध व आन्दोलन को समर्थन देने की आवश्यकता है |सभी क्षेत्र के ग्रामीणों व किसानो द्वारा कम्पनियों के हित में किए जा रहे अधिग्रहण के विरोध के लिए आगे आने की आवश्यकता है देश के खाद्यान्न उत्पादन के रकबे के अधिग्रहण के विरोध के लिए खाद्यान्नों की महगाई झेल रहे कृषक हिस्सों को भी आगे आने की आवश्यकता है |
उन वैश्वीकरण नीतियों ,सम्बन्धो के विरोध की आवश्यकता है ,जिसके अंतर्गत किसानो व कृषि क्षेत्र के संकटो को तेजी से बढ़ते जाने के साथ अब कृषि भूमि के हडप लेने की प्रक्रिया को भी बढ़ाया जा रहा है |
भूमि अधिग्रहण के लिए इस तर्क का सहारा लेना कत्तई गलत है कि सरकार ही जमीन की वास्तविक मालिक है |इसलिए वह इसका अधिग्रहण जब चाहे कर सकती है |
यह कहना सरकारों द्वारा व्यापक किसानो ,ग्रामीणों ,की उपेक्षा को गावं व जमीन से अन्यायपूर्ण बेदखली को न्याय संगत ठहराना है |अधिग्रहीत भूमि का कम्पनियों को किया जा रहा अन्यायपूर्ण हस्तांतरण को उचित ठहराना है |
सही बात तो यह है कि भूमि अधिग्रहण का मौजूदा दौर और उस पर गढ़े जाने वाले उपरोक्त तर्क भी इसबात की पुष्टि करते है ,देश की सत्ता सरकारे भले ही अपने आप को जनतान्त्रिक सरकारे कहती है ,लेकिन उनका असली काम कम्पनी राज व सरकारे करती है , लेकिन उनका असली काम क्म्पब्नी राज व सरकार का ही है इसका सबूत उन तमाम कानूनों में ,भूमि अधिग्रहण कानून (१८९४ )में भी देखा जा सकता है ,जिसे ब्रिटिश सत्ता के काल में बने कानूनों का वर्तमान राज व सरकार द्वारा संचालन ,उसके स्वतंत्र राज व जनतान्त्रिक राज होने का नही ,अपितु कम्पनी राज होने का सबूत है |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

 

Thursday, 31 March 2011

शमशान

चुप्पी ख़ामोशी उदासी ओढ़े
हर शमशान
लाशों, लकड़ियों और कफन के
इंतजार में शिद्दत के साथ
मुद्दत से अपनी भूमिका में खड़ा है
न जाने कितनी लाशें
अब तक हो चुकी होंगी पंचतत्व में विलीन
गुमनामी के अँधेरे में खो चुके हैं -
न जाने कितने हाड़-मास के पुतले
स्मृतियों में कुछ शेष रह जाती हैं आकृतियाँ
कुछ आकृतियाँ छोड़ जाती हैं
अपने कामों का इतिहास
-सुनील दत्ता

भगत सिंह द्वारा फांसी के पूर्व पंजाब गवर्नर के नाम लिखा प्रत्र


युद्ध अभी जारी है ......हमें ....गोली से उड़ा दिया जाये
..........महोदय
उचित सम्मान के साथ हम नीचे लिखी बाते .आपकी सेवा में रख रहे हैं -
भारत की ब्रीटिश सरकार के सर्वोच्च अधिकारी वाइसराय ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहौर षड़यंत्र अभियोग की सुनवाई के लिए एक विशेष न्यायधिकर्ण (ट्रिबुनल ) स्थापित किया था ,जिसने 7 अक्टुबर ,1930 को हमें फांसी का दंड सुनाया | हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया हैं कि हमने सम्राट जार्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया हैं |
न्यायालय के इस निर्णय से दो बाते स्पष्ट हो ज़ाती हैं -पहली यह कि अंग्रेजी जाति और भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा हैं |दूसरी यह हैं कि हमने निशचित रूप में इस युद्ध में भाग लिया है |अत: हम युद्ध बंदी हैं | यद्यपि इनकी व्याख्या में बहुत सीमा तक अतिशयोक्ति से काम लिया गया हैं , तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि ऐसा करके हमें सम्मानित किया गया हैं |पहली बात के सम्बन्ध में हमें तनिक विस्तार से प्रकाश डालना चाहते हैं |
हम नही समझते कि प्रत्यक्ष रूप से ऐसी कोई लड़ाई छिड़ी हुई हैं | हम नहीं जानते कि युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या हैं ? परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हैं और साथ ही इसे इसके ठीक सन्दर्भ को समझाना चाहते हैं | ......................
युद्ध कि स्थिति
हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ाहुआ हैं और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा हैं -चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों ,उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी हैं |चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नही पड़ता |यदि आपकी सरकार कुछ नेताओ या भारतीय समाज के मुखियों पर प्रभाव जमाने में सफल हो जाये ,कुछ सुविधाय मिल जाये ,अथवा समझौते हो जाये ,इससे भी स्थिति नही बदल सकती ,तथा जनता पर इसका प्रभाव बहुत कम पड़ता हैं | हमे इस बात की भी चिन्ता नही कि युवको को एक बार फिर धोखा दिया गया हैं और इस बात का भी भय नहीं हैं कि हमारे राजनीतिक नेता पथ - भर्स्ट हो गये हैं और वे समझौते की बातचीत में इन निरपराध ,बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गये हैं ,जिन्हें दुर्भाग्य से क्रन्तिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता हैं |हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु समझते है ,क्योकि उनके विचार में वे हिंसा में विश्वास रखते हैं |हमारी वीरागनाओ ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया हैं |उन्होंने अपने पतियों को बलिबेदी पर भेट किया ,भाई भेट किये ,और जो कुछ भी उनके पास था -सब न्यौछावर कर दिया |उन्होंने अपने आप को भी न्यौछावर कर दिया परन्तु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही समझती हैं |आपके एजेन्ट भले ही झूठी कहानिया बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और पार्टी की प्रसिद्धी को हानि पहुचाने का प्रयास करें ,परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा |
युद्ध के विभिन्न स्वरूप
........................
हो सकता हैं कि यह लड़ाई भिन्न -भिन्न दशाओ में भिन्न -भीं स्वरूप ग्रहण करे |किसी समय यह लड़ाई प्रकट रूप ले ले ,कभी गुप्त दशा में चलती रहे ,कभी भयानक रूप धारण के ले ,कभी किसान के स्तर पर युद्ध जारी रहे और कभी यह घटना इतनी भयानक हो जाये कि जीवन और मृत्यु की बाज़ी लग जाये |चाहे कोई भी परिस्थिति हो ,इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा |यह आप की इच्छा हैं की आप जिस परिस्थिति को चाहे चुन लें ,परन्तु यह लड़ाई जारी रहेगी |इसमें छोटी -छोटी बातो पर ध्यान नही दिया जायेगा |बहुत सम्भव हैं कि यह युद्ध भयंकर स्वरूप ग्रहण कर ले |पर निश्चय ही यह उस समय तक समाप्त नही होगा जब तक कि समाज का वर्तमान ढाचा समाप्त नही हो जाता ,प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन या क्रांति समाप्त नही हो जाती और मानवी सृष्टी में एक नवीन युग का सूत्रपात नही हो जाता |
अन्तिम युद्ध .........
निकट भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा |साम्राज्यवाद व पूजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं |यही वह लड़ाई हैं जिसमे हमने प्रत्यक्ष रूप में भाग लिया हैं और हम अपने पर गर्व करते है कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारम्भ ही किया हैं और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा हमारी सेवाए इतिहास के उस अध्याय में लिखी जाएगी जिसको यतीन्द्रनाथ दास और भगवतीचरण के बलिदानों ने विशेष रूप में प्रकाशमान कर दिया हैं | इनके बलिदान महान हैं |जहाँ तक हमारे भाग्य का सम्बन्ध हैं हम जोरदार शब्दों में आपसे यह कहना चाहते हैं कि आपने हमें फांसी पर लटकाने का निर्णय कर लिया हैं |आप ऐसा करेंगे ही |आपके हाथो में शक्ति हैं और आपको अधिकार भी प्राप्त हैं |परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भैंसवाला सिद्धांत ही अपना रहे हैं और आप उस पर कटिबद्ध हैं |हमारे अभियोग की सुनवाई इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि हमने कभी कोई प्रार्थना नही की और अब भी हम आप से किसी प्रकार की दया की प्रार्थना नही करते |हम आप से केवल यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग हैं | इस स्थिति में हम युद्धबंदी हैं ,अत:इस आधार परहम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबन्दियो -जैसा ही व्यवहार किया जाये और हमें फांसी देने के बदले गोली से उड़ादिया जाये |अब यह सिद्ध करना आप का काम हैं कि आपको उस निर्णय में विश्वास हैं जो आपकी सरकार के न्यायालय ने किया हैं |आप अपने कार्य द्वारा इस बात का प्रमाण दीजिये |हम विनयपूर्वक आप से प्रार्थनाकरते हैं कि आप अपने सेना -विभाग को आदेश दे दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली भेज दी जाये |

...............भवदीय
भगतसिंह ,राजगुरु ,सुखदेव
प्रस्तुती सुनील दत्ता

गाँधी जी के नाम खुली चिट्ठी

{ गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी मार्च १९३१ में गाँधी जी और वायसराय इरविन के बीच हुए समझैते के बाद लिखी गई थी जो हिंदी नवजीवन 30 अप्रैल 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी }
परम कृपालु महात्मा जी ,

आजकल की ताज़ा खबरों से मालूम होता है कि{ ब्रिटिश सरकार से } समझौते की बातचीत कि सफलता के बाद आपने क्रन्तिकारी कार्यकर्ताओं को फिलहाल अपना आन्दोलन बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौका देने के लिए कई प्रकट प्राथनाए कई है |वस्तुत ; किसी आन्दोलन को बन्द करना केवल आदर्श या भावना में होने वाला काम नहीं हैं |भिन्न -भिन्न अवसरों कि आवश्यकता का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता हैं |
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान , आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष किया ,न इसे छिपा ही रखा की समझौता होगा |में मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिलकुल आसानी के साथ यह समझ गये होंगे कि आप के द्वारा प्राप्त तमाम सुधारो का अम्ल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले -मकसूद पर पहुच गये हैं | सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक न मिले ,तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए कांग्रेस महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बंधी हुई हैं | उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझैता सिर्फ काम चलाऊ युद्ध विराम हैं |जिसका अर्थ येही होता होता हैं कि अधिक बड़े पएमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोडा विश्राम हैं ........
किसी भी प्रकार का युद्ध -विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआवो का हैं | लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आप ने फिलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा हैं |इसके वावजूद भी वह प्रस्ताव तो कायम ही हैं |इसी तरह 'हिन्दुस्तानी सोसलिस्ट पार्टी ' के नाम से ही साफ़ पता चलता हैं कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाजवादी प्रजातन्त्र कि स्थापना करना हैं |यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नही हैं |जब तक उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो , तब तक वे लड़ाई जरी रखने के लिए बंधे हुए हैं |परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध .निति बदलने को तैयार अवश्य होंगे |क्रन्तिकारी युद्ध ,जुदा ,जुदा रूप धारण करता हैं |कभी गुप्त ,कभी केवल आन्दोलन -रूप होता हैं ,और कभी जीवन -मरण का भयानक सग्राम बन जाता हैं |ऐसी दशा में क्रांतिवादियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए विशेष कारणहोने चाहिए |परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया |निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतीवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नही होता ,हो भी नही सकता |
आप के समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया हैं ,और फलस्वरूप आप केसब कैदी रिहा हुए हैं |पर क्रन्तिकारी कैदियों का क्या हुआ ?1915 ई . से जेलों में पड़े हुए गदर - पक्ष के बीसो कैदी सज़ा कि मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़रहे हैं |मार्शल ला के बीसों कैदी आज भी जिन्दा कब्रों में दफनाये पड़े हैं |येही हाल बब्बर अकाली कैदियों का हैं |देवगढ , काकोरी ,मछुआ -बाज़ार और लाहौर षड़यंत्र के कैदी अब तक जेल कि चहारदीवारी में बन्द पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं लाहौर ,दिल्ली चटगाँव बम्बई कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज्यादा षड़यंत्र के मामले चल रहे हैं |बहुसंख्य क्रांतिवादी भागते फिरते हैं ,और उनमे कई इस्त्रिया हैं \सचमुच आधी दर्जन से अधिक कैदी फांसी पर लटकने कि राहदेख रहे हैं | लाहौरषड़यंत्र केस के सजायाफ्ता तीन कैदी , जो सौभाग्य से मशहूर हो गये और जिन्होंने जनता क़ी बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की हैं ,वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नही हैं |उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नही हैं |सच पूछा जाये तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फांसी पर चढ़ जाने से अधिक लाभ होने की आशा हैं |
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते हैं |वे ऐसा क्यों करे ?आपने कोई निशचित वस्तु की ओर निर्देश नही किया हैं | ऐसी दशा में आपकी प्रथ्र्नाओ का येही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को कुचल देने में नौकरशाही कि मदद कर रहे हैं ,और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को रास्ट्रद्रोह पलायन और विश्वास घात का उपदेश करना हैं |यदि ऐसी बात नही है ,तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते |अपना आन्दोलन बन्द करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्दी की प्रतीति कर लेने का प्रयत्न करना चाहिए था |में नही मानता किआप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं | में आप को कहता हूँ कि वस्तु इस्थिति ठीक इसकी उल्टी हैं सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं ,और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं ,उसका उन्हें पूरा -पूरा ख्याल होता है |और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग कि अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यन्त महत्व का मानते हैं |हालाकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटेरहने के सिवाए और कोई चारा उनके लिए नही हैं |
उनके प्रति सरकार कि मौजूदा नीति यह है कि लोगो की ओरसे उन्हें अपने आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है ,उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाये |अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है |ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि -भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी | इसलिए हम आप से प्रार्थना करते है कि या तो आप कुछ क्रन्तिकारी नेताओ से बातचीत कीजिये -उनमे से कई जेलों में हैं -और उनके साथ सुलह कीजिये या सब प्रार्थना बन्द रखिये |कृपा कर हित कि दृष्टि से इन दो में से कोई एक रास्ता चुन लीजिये और सच्चे दिल से उस पर चलिए |अगर आप उनकी मदद न कर सके ,तो मेहरबानी करके उन पर रहम करे |उन्हें अलग रहने दें |वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं ...........
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हो तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल कि पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिये |आशा है ,आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्व साधारण के सामने प्रगट करंगे |

आपका
अनेको में से एक सुखदेव

सुनील दत्ता
9415370672

भगत सिंह फांसी के समय


लाहोर जेल के चीफ वाडर सरदार चतर सिंह ने बताया कि 23 मार्च , 1931 को शाम तीन बजे ,जब उसे फंसी का पता चला तो वह भगतसिंह के पास गया और कहा कि "मेरी केवल एक प्राथना है कि अंतिम समय में वाहे गुरु का नाम ले ले और गुरुवाणी का पाठ कर ले '|
भगत सिंह ने जोर से हंस कर कहा 'आप के प्यार को शुक्रगुजार हूँ | लेकिन अब जब अंतिम समय गया। मैं ईश्वर को याद करू तो वह कहेगा कि मैं बुजदिल हूँ | सारी उम्र तो उसे याद नहीं किया और अब मौत सामने नजर आने लगी हैं तो ईश्वर को याद करने लगूँ| इसलिए येही अच्छा येही होगा कि मैंने जिस तरह पहले अपना जीवन जिया हैं ,उसी तरह अपना अंतिम समय भी गुजारूं | मेरे उपर यह आरोप तो बहुत लगायेंगे कि भगत सिंह नास्तिक था और उसने ईश्वर में विश्वास नही किया ,लेकिन ये आरोप तो कोई नही लगाएगा कि भगतसिंह कायर बेईमान भी था और अंतिम समय उसके पैर लड़खड़ाने लगे|'
(भगतसिंह - प्रो दीदार सिंह , पन्ना 346 ) दूसरे व्यक्ति ,जो अंतिम दिन भगतसिंह से मिले ,वे उनके परामर्शदाता वकील प्राणनाथ मेहता थे |एकदिन पहले भगतसिंह ने लेनिन की जीवनी की मांग की थी , सो अंतिम दिन मेहता जी लेलिन की जीवनी भगतसिंह को दे गये |
आखरी पलो तक वे बड़ी निष्ठा और एकाग्रचित से लेलिन की जीवनी पढ़ रहे थे |जब जेल के कर्मचारी उन्हें लेने आये तो उन्होंने कहा 'ठहरो एक क्रन्तिकारी के दूसरे क्र्न्तकारी से मिलने में बाधा डालो | और फिर २३ मार्च 1931 को संध्या समय सरकार ने उनसे साँस लेने का अधिकार छीनकर अपनी प्रतिहिंसा की प्यास बुझा ली |अन्याय और शोषण के विरुद्ध विद्रोह करने वाले तीन तरुणों की जिन्दगिया जल्लाद के फंदे ने समाप्त कर दी |फांसी के तख्ते पर चढ़ते भगतसिंह ने अंग्रेज मजिस्ट्रेट को सम्बोधित करते हुए कहा 'मजिस्ट्रेट महोदय आप वास्तव में बड़े भाग्यशाली हैं कयोकि आपको यह देखने का अवसर प्राप्त हो रहा हैं कि एक भारतीय क्रन्तिकारी अपने महान आदर्श के लिए किस प्रकार हँसते -हँसते मृत्यु का आलिगन करता हैं |फांसी से कुछ पहले भाई के नाम अपने अंतिम पत्र में उसने लिखा था ,मेरे जीवन का अवसान समीप है प्रात: कालीन प्रदीप टिमटिमाता हुआ मेरा जीवन -प्रदीप भारत के प्रकाश में विलीन हो जायेगा |हमारा आदर्श हमारे विचार सरे संसार में जागृती पैदा कर देंगे |फिर यदि यह मुठ्ठी भर राख विनष्ट हो जाये तो संसार का इससे क्या बनता बिगड़ता है |जैसे -जैसे भगतसिंह के जीवन का अवसान समीप आता गया देश तथा मेहनतकश जनता के उज्जवल भविष्य में उसकी आस्था गहरी होती गयी | मृत्यु से पहले सरकार सरकार के नाम लिखे एक पत्र में उसने कहा था ,' अति शीघ्र ही अंतिम संघर्ष के आरम्भ की दुन्दुभी बजेगी |उसका परिणाम निर्णायक होगा |साम्राज्यवाद और पूँजीवाद अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहे हैं| हमने उसके विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था और उसके लय हमे गर्व हैं।

सुनील दत्ता
9415370672

भगत सिंह का पिता के नाम पत्र

भगत सिंह, भगत सिंह के बाबा पिता

३० सितम्बर ,१९३० को भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिबुनल को एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की मांग की |सरदार किशनसिंह स्वय देशभक्त थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल जाते रहते थे |
पिता द्वारा दी गयी अर्जी से भगत सिंह की भावनाओ को भी चोट लगी थी ,लेकिन अपनी भावनाओ को नियंत्रित कर अपने सिद्धांतो पर जोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर 1930 को यह पत्र लिखा जो उसके पिता को देर से मिला | ७ अक्टूबर ,1930 को मुकदमे का फैसला सुना दिया गया |

4 अक्टूबर 1930
पूज्य पिताजी ,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई की आप ने मेरे बचाव -पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा हैं |यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे ख़ामोशी से बर्दाश्त नही कर सका |इस खबर ने मेरे भीतर कि शांति भंग कर उथल -पुथल मचा दी हैं |मैं यह नही समझ सकता कि वर्तमान इस्थितियो में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं ?
आप का पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओ का पूरा सम्मान करता हूँ कि आप को साथ सलाह -मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नही था |आप जानते हैं कि राजनैतिक क्षेत्र में मेरे विचार आप से काफी अलग हैं |में आप कि सहमती या असहमति का ख्याल किये बिना सदा स्व्तन्त्र्तापुर्वक काम करता रहा हूँ |
मुझे यकीन हैं कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे यह बात मनवा लेने की कोशिश करते हैं कि में अपना मुकदमा संजीदगी से लडू और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करू| लेकिन आपको यह भी मालूम है कि में सदा इसका विरोध करता रहा हूँ | मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा प्रकट नही की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया हैं |
मेरी जिन्दगी इतनी कीमती नही जितनी कि आप सोचते हैं |कम -से कम मेरे लिए तो इस जीवन की इतनी कीमत नही कि इसे सिद्धांतो को कुर्बान करके बचाया जाये |मेरे अलावा मेरे और साथी भी हैं जिनके मुकदमे इतने ही संगीन है जितना कि मेरा मुकदमा | हमने सयुक्त योजना पर हम अंतिम समय तक डटे रहेंगे | हमे इस बात कि कोई परवाह नही कि हमे व्यक्तिगत रूप में इस बात के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा |
पिता जी मैं बहुत दुःख का अनुभव कर रहा हूँ |मुझे भय हैं ,आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आप के इस काम कि निन्दा करते हुए मैं कंही सभ्यता कि सीमाए न लाघ जाऊ और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हो जाये |लेकिन में स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा |यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता |लेकिन आप के सन्दर्भ में मैं इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है -निचले स्तर कि कमजोरी |
यह एक ऐसा समय था जब हम सब का इम्तहान हो रहा था |में यह कहना चाहता हूँ कि आप इस इम्तहान में नाकाम रहे है |में जनता हूँ कि आप भी इतने ही देश प्रेमी है जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता हैं |में जनता हूँ कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत कि आज़ादी के लिए लगा दी हैं |लेकिन इस अहम मौड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखाई ,यह बात में समझ नही सकता |
अन्त में मैं आपसे ,आपके अन्य मित्रो व मेरे मुकदमे में दिलचस्पी लेने वालो से यह कहना चाहता हूँ कि में आपके इस कदम को नापसंद करता हूँ |में आज भी अदालत अपना बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नही हूँ |अगर अदालत हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकर्ण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन को मंजूर कर लेती , तो भी में कोई स्पष्टीकर्ण प्रस्तुत न करता |
मैं चाहूँगा की इस समबन्ध में जो उलझने पैदा हो गयी हैं ,उनके विषय में जनता को असलियत का पता चल जाये |इसलिए में आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप जल्द से जल्द यह चिठ्ठी प्रकाशित कर दें |

आपका आज्ञाकारी
भगत सिंह

सुनील दत्ता
9415370672

शहीद दिवस विशेष : क्रांति और जीवन भगत सिंह




क्रांति हौव्वा नही ; भगत सिंह को दो तरह का हौव्वा बनाकर पेश किया जाता रहा है |एक तो व्यहारिकता का कि भगत सिंह पड़ोसी के घर ही अच्छा लगता है -अपने घर में उसका होना आज कि परिस्थितियों में वांछित नही |दूसरा आदर्श का कि विचारो -कार्यशालाओ से भगत सिंह को नही अपनाया जा सकता -उसके लिए जेल और मृत्यु की कामना करने की जरूरत होती हैं |इन दोनों पूर्वाग्रहों के पीछे भगतसिंह की वह छवि काम कर रही होती है जो उनके दो बेहद प्रचलित प्रकरणों -साड्स -वध और असेम्बली -बम धमाका -को एकान्तिक रूप से देकने से बनी हैं | क्योंकि येही प्रकरण उनकी लोकप्रिय छवि का आधार भी बनाए जाते है ,लिहाज़ा उपरोक्त पूर्वाग्रहों को सार्वजनिक रूप से मीन-मेख का सामना प्राय ; नही करना पड़ता |
पर भगतसिंह को पुरवाग्रहो से नही ,तर्क से जानना होगा -एकान्तिक रूप से नही परिपेक्ष में देखना होगा | वे क्रन्तिकारी थे, आतंकवादी नही -तभी उन्होंने कभी भी सांडर्स -वध को ग्लोरिफाई नही किया और असेम्बली में बम फोड़ते समय यह सावधानी भी रखी कि किसी की जान न जाये |वे हाड -मांस के ऐसे मनुष्य थे जिसके प्रेम ,स्वप्न ,जीवन ,राजनीत ,देश -प्रेम गुलामी और धर्म जैसे विषयों पर बेहद लौकिक विचार थे |तभी उन्होंने मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के हर स्वरूप -साम्राज्यवाद ,साम्प्रदायिकता ,जातिवाद ,असमानता ,भाषा वाद ,भेदभाव इत्यादि का पुरजोर विरोध किया |फांसी से एक दिन पूर्व साथियों को अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा -स्वाभाविक है कि जीने कि इच्छा मुझमे भी होनी चाहिए ,मैं इसे छिपाना नही चाहता |जब उन्होंने मृत्यु को चुना तब भी लौकिकता और तार्किकता के दम पर ही |अगर वे सिर पर कफन बांधे मृत्यु के आलिंगन को आतुर कोई अलौकिक सिरफिरे मात्र होते तो सांडर्स -वध के समय ही फांसी का वरण कर लेते |सांडर्स -वध के बाद फरारी और असेम्बली बम कांड के बाद ,जब वे भाग सकते थे ,समपर्ण उनकी अदम्य तार्किकता का ही परिचायक है |भगतसिंह से दोस्ती का मतलब उनकी इसी लौकिकता और तार्किकता को आत्मसात करना भी है |इन अर्थो में यह कठिन रास्ता है -न कि जेल ,पुलिस ,मौत जैसे सन्दर्भ में | क्या हम ईमानदारी ,सच्चाई ,साहस ,भाईचारा ,बराबरी और देशप्रेम को अपने जीवन का अंग बनाना चाहते हैं ? क्या हम शोषण के तमाम रूपों को पहचानने और फिर उनसे लोहा लेने कि शुरुवात खुद से ,अपने परिवार से ,अपने परिवेश से कर सकते है ?
यदि हाँ ,तो घर -घर में भगत सिंह होंगे ही जो शोषण के तमाम पारिवारिक ,सामाजिक ,जातीय ,लैगिक ,राजनैतिक ,साम्राज्यवादी व आर्थिक रूपों कि पहचान करेंगे और उनसे लोहा लेंगे |जेल से भगत का कहा याद रखिए -'क्रन्तिकारी को निरर्थक आतंकवादी कारवाइयो और व्यकितगत आत्म -बलिदान के दूषित चर्क में न डाला जाये |सभी के लिए उत्साह वर्धक आदर्श ,उद्देश्य के लिए मरना न होकर उद्देश्य के लिए जीना -और वह भी लाभदायक तरीके से योग्य रूप में जीना -होना चाहिए |
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत ने २२ दिसम्बर १९२९ को जेल से लिखे 'माडर्न रिव्यू 'के सम्पादक को प्रति -उत्तर में इन्कलाब जिंदाबाद नारे को परिभाषित करते हुए क्रांति से जोड़ा -दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है ,जो सम्भव है भाषा के नियमो एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए ,परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारो को पृथक नही किया जा सकता ,जो इसके साथ जुड़े हुए हैं |ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ का घोतक हैं ,जो एक सीमा तक उनमे पैदा हो गये हैं तथा एक सीमा तक उनमे निहित है |क्रांति (इन्कलाब )का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आन्दोलन नही होता |बम और पिस्टल कभी कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते है |इसमें भी सन्देह नही है कि कुछ आंदोलनों में बम एवं पिस्टल एक महत्त्व पूर्ण साधन सिद्ध होते है ,परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्टल क्रांति के पर्यायवाची नही हो जाते |विदोढ़ को क्रांति नही कहा जा सकता ,यद्धपि यह हो सकता है कि विदोढ़ का अंतिम परिणाम क्रांति हो |.........क्रांति शब्द का अर्थ 'प्रगति के लिए परिवर्तन कि भावना एवं आकाक्षा है |लोग साधारण तया जीवन कि परम्परा गत दशाओं के साथ चिपक जाते है और परिवर्तन के विचार से ही कापने लगते है |
यह एक अकर्मण्यता कि भावना है , जिसके स्थान पर क्रन्तिकारी भावना जागृत करने कि आवश्यकता हैं।
'क्रांति कि इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओतप्रोत रहनी चाहिए ,जिससे की रुदिवादी शक्तिया मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सके |यह आवश्यक है की पुराणी व्यवस्था सदैव न रहे वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे ,जिससे की एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके |यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रखकर हम इन्कलाब जिंदाबाद का नारा ऊँचा करते है |

साभार भगतसिंह से दोस्ती पुस्तक से


सुनील दत्ता
09415370672

भगत सिंह

भगत सिंह का पिता के नाम पत्र

भगत सिंह, भगत सिंह के बाबा पिता

३० सितम्बर ,१९३० को भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिबुनल को एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की मांग की |सरदार किशनसिंह स्वय देशभक्त थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल जाते रहते थे |
पिता द्वारा दी गयी अर्जी से भगत सिंह की भावनाओ को भी चोट लगी थी ,लेकिन अपनी भावनाओ को नियंत्रित कर अपने सिद्धांतो पर जोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर 1930 को यह पत्र लिखा जो उसके पिता को देर से मिला | ७ अक्टूबर ,1930 को मुकदमे का फैसला सुना दिया गया |

4 अक्टूबर 1930
पूज्य पिताजी ,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई की आप ने मेरे बचाव -पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा हैं |यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे ख़ामोशी से बर्दाश्त नही कर सका |इस खबर ने मेरे भीतर कि शांति भंग कर उथल -पुथल मचा दी हैं |मैं यह नही समझ सकता कि वर्तमान इस्थितियो में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं ?
आप का पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओ का पूरा सम्मान करता हूँ कि आप को साथ सलाह -मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नही था |आप जानते हैं कि राजनैतिक क्षेत्र में मेरे विचार आप से काफी अलग हैं |में आप कि सहमती या असहमति का ख्याल किये बिना सदा स्व्तन्त्र्तापुर्वक काम करता रहा हूँ |
मुझे यकीन हैं कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे यह बात मनवा लेने की कोशिश करते हैं कि में अपना मुकदमा संजीदगी से लडू और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करू| लेकिन आपको यह भी मालूम है कि में सदा इसका विरोध करता रहा हूँ | मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा प्रकट नही की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया हैं |
मेरी जिन्दगी इतनी कीमती नही जितनी कि आप सोचते हैं |कम -से कम मेरे लिए तो इस जीवन की इतनी कीमत नही कि इसे सिद्धांतो को कुर्बान करके बचाया जाये |मेरे अलावा मेरे और साथी भी हैं जिनके मुकदमे इतने ही संगीन है जितना कि मेरा मुकदमा | हमने सयुक्त योजना पर हम अंतिम समय तक डटे रहेंगे | हमे इस बात कि कोई परवाह नही कि हमे व्यक्तिगत रूप में इस बात के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा |
पिता जी मैं बहुत दुःख का अनुभव कर रहा हूँ |मुझे भय हैं ,आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आप के इस काम कि निन्दा करते हुए मैं कंही सभ्यता कि सीमाए न लाघ जाऊ और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हो जाये |लेकिन में स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा |यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता |लेकिन आप के सन्दर्भ में मैं इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है -निचले स्तर कि कमजोरी |
यह एक ऐसा समय था जब हम सब का इम्तहान हो रहा था |में यह कहना चाहता हूँ कि आप इस इम्तहान में नाकाम रहे है |में जनता हूँ कि आप भी इतने ही देश प्रेमी है जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता हैं |में जनता हूँ कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत कि आज़ादी के लिए लगा दी हैं |लेकिन इस अहम मौड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखाई ,यह बात में समझ नही सकता |
अन्त में मैं आपसे ,आपके अन्य मित्रो व मेरे मुकदमे में दिलचस्पी लेने वालो से यह कहना चाहता हूँ कि में आपके इस कदम को नापसंद करता हूँ |में आज भी अदालत अपना बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नही हूँ |अगर अदालत हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकर्ण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन को मंजूर कर लेती , तो भी में कोई स्पष्टीकर्ण प्रस्तुत न करता |
मैं चाहूँगा की इस समबन्ध में जो उलझने पैदा हो गयी हैं ,उनके विषय में जनता को असलियत का पता चल जाये |इसलिए में आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप जल्द से जल्द यह चिठ्ठी प्रकाशित कर दें |

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Monday, 28 March 2011

अजीब थी वो
मुहब्बतों की गीत थी , बगावतों की राग थी
कभी
वो सिर्फ फूल थी , कभी वो सिर्फ आग थी
अजीब थी वो

वो मुफलिसों से कहती थी
की दिन बदल भी सकते है
वों जाबिरों से कहती
तुम्हारे सर पे सोने का जो ताज है
कभी पिघल भी सकते है
वो बंदिशों से कहती
की में तुमको तोड़ सकती हूँ
सहूलतों से कहती
की में तुमको छोड़ सकती हूँ
हवाओं से वो कहती की में तुमको मोड़ सकती हूँ
वो ख्वाबों से कहती
की में तुमको सच करूंगी
अजीब थी वो
कभी आग थी वो
कभी फुल थी वो
अजीब थी वो..!
एक तुम्हारा होना

क्या से क्या कर देता है

बेजुबान छत दीवारों को

घर कर देता है

खाली शब्दों में

आता है

ऐसा अर्थ पिरोना

गीत बन गया सा

लगता है

घर का कोना कोना

एक तुम्हारा होना

सपनों को स्वर देता है

आरोहों अवरोहों से

समझाने

लगती है

तुमसे जुड़कर
चीज़ें भी

बतियाने लगाती है
एक तुम्हारा होना

अपनापन भर देता है

एक तुम्हारा होना

क्या से क्या कर देता है
नील
वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज्म नजर आती है.
मैं इस अनलिखी नज्म को
कई बार लिख चुका हूं.
फिर भी हर बार
यह अनलिखी ही रह जाती है.
हो सकता है
यह अनलिखी नज्म
लिखने के लिए
हो ही ना,
सिर्फ जीने के लिए हो.