Monday, 11 April 2011

अपसंस्कृति


दुनिया की आप़ा धापी में शामिल लोग
भूल चुके है अलाव की संस्कृति
नहीं रहा अब बुजुर्गों की मर्यादा का ख्याल
उलझे धागे की तरह नहीं सुलझाई जाती समस्याएं
संस्कृति , संस्कार ,परम्पराओं की मिठास को
मुंह चिढाने लगी हैं अपसंस्कृति की आधुनिक बालाएं
अब वसंत कहाँ ?
कहां ग़ुम हो गयीं खुशबू भरी जीवन की मादकता
उजड़ते गावं -दरकते शहर के बीच
उग आई हैं चौपालों की जगह चट्टियां
जहाँ की जाती ही व्यूह रचना
थिरकती हैं षड्यंत्रों की बारूद
फेकें जाते हैं सियासत के पासे
भभक उठती हैं दारू की गंध -और हवाओं में तैरने लगती हैं युवा पीढ़ी
गूँज उठती हैं पिस्टल और बम की डरावनी आवाज़
सहमी-सहमी उदासी पसर जाती हैं
गावं की गलियों ,खलिहानों और खेतों की छाती पर
यह अपसंस्कृति का समय हैं |

-सुनील दत्ता
मोबाइल- 09415370672

नये विचारों की रोशनी में


संघर्ष
देखा है मैंने तुम्हें
ताने सुनते/जीवन पर रोते
देखा है मैंने तुम्हे सांसों-सांसों पर घिसटते
नये रूप / नये अंदाज में
देखा है मैंने तुम्हें
पल-पल संघर्ष में उतरते
मानो कह रही हो तुम
बस - बस -बस
अब बहुत हो चुका ?
सहेंगे अत्याचार, सुनेंगे ताने
हर जुल्म का करेंगे प्रतिकार
नये विचारों की रोशनी में।

-सुनील दत्ता

Saturday, 9 April 2011

जन्मदिन विशेष : महापंडित राहुल सांकृत्यायन

राहुल जी का समग्र जीवन ही रचनाधर्मिता की यात्रा थी। जहाँ भी वे गए वहाँ की भाषा व बोलियों को सीखा और इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज व साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया। राहुल सांकृत्यायन उस दौर की उपज थे जब ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे। वह दौर समाज सुधारकों का था एवं काग्रेस अभी शैशवावस्था में थी। इन सब से राहुल अप्रभावित न रह सके एवं अपनी जिज्ञासु व घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी सन्यासी से लेकर वेदान्ती, आर्यसमाजी व किसान नेता एवं बौद्ध भिक्षु से लेकर साम्यवादी चिन्तक तक का लम्बा सफर तय किया। सन् १९३० में श्रीलंका जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये एवं तभी से वे ‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ हो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाये। उनकी अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी एवं इस प्रकार वे केदारनाथ पाण्डे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। सन् १९३७ में रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में उन्होंने संस्कृत अध्यापक की नौकरी कर ली और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली, जिससे उन्हें इगोर राहुलोविच नामक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल ने उपन्यास, निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण व जीवनी आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया परन्तु अधिकांश साहित्य हिन्दी में ही रचा। राहुल तथ्यान्वेषी व जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे सो उन्होंने हर धर्म के ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। अपनी दक्षिण भारत
यात्रा के दौरान संस्कृत-ग्रन्थों, तिब्बत प्रवास के दौरान पालि-ग्रन्थों तो लाहौर यात्रा के दौरान अरबी भाषा सीखकर इस्लामी धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन किया। निश्चितत: राहुल सांकृत्यायन की मेधा को साहित्य, अध्यात्म, ज्योतिष, विज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा, संस्कृति, धर्म एवं दर्शन के टुकड़ों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता वरन् समग्रतः ही देखना उचित है।

बौद्ध -धर्म की ओर झुकाव

महापंडित राहुल सांकृत्यायन
१९१६ तक आते-आते इनका झुकाव बौद्ध -धर्म की ओर होता गया। बौद्ध धर्म में दीक्षा लेकर , वे राहुल सांकृत्यायन बने । बौद्ध धर्म में लगाव के कारण ही ये पाली,प्राकृत ,अपभ्रंश ,आदि भाषाओ के सीखने की ओर झुके ।१९१७ की रुसी क्रांति ने राहुल जी के मन को गहरे में प्रभावित किया। वे अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव भी रहे। उन्होंने तिब्बत की चार बार यात्रा की और वहा से विपुल साहित्य ले कर आए। १९३२ को राहुल जी यूरोप की यात्रा पर गए। १९३५ में जापान, कोरिया, मंचूरिया की यात्रा की। १९३७ में मास्को में यात्रा के समय भारतीय-तिब्बत विभाग की सचिव लोला येलेना से इनका प्रेम हो गया। और वे वही विवाह कर के रूस में ही रहने लगे। लेकिन किसी कारण से वे १९४८ में भारत लौट आए।
राहुल जी को हिन्दीऔर हिमालय से बड़ा प्रेम था। वे १९५० में नैनीताल में अपना आवास बना कर रहने लगे। यहाँ पर उनका विवाह कमला सांकृत्यायन से हुआ। इसके कुछ बर्षो बाद वे दार्जिलिंग(पश्चिम बंगाल) में जाकर रहने लगे ,लेकिन बाद में उन्हें मधुमेह से पीड़ित होने के कारण रूस में इलाज कराने के लिए भेजा गया। १९६३ में सोवियत रूस में लगभग सात महीनो के इलाज के बाद भी उनका स्वास्थ्य ठीक नही हुआ। १४ अप्रैल १९६३ को उनका दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में देहांत हो गया

साहित्यिक रुझान

राहुल जी वास्तव के ज्ञान के लिए गहरे असंतोष में थे, इसी असंतोष को पूरा करने के लिए वे हमेशा तत्पर रहे। उन्होंने हिन्दी साहित्य को विपुल भण्डार दिया। उन्होंने मात्र हिन्दी साहित्य के लिए ही नही बल्कि वे भारत के कई अन्य क्षेत्रों के लिए भी उन्होंने शोध कार्य किया । वे वास्तव में महापंडित थे। राहुल जी की प्रतिभा बहुमुखी थी और वे संपन्न विचारक थे। धर्म ,दर्शन ,लोकसाहित्य ,यात्रासहित्य ,इतिहास ,राजनीति, जीवनी, कोष, प्राचीन ग्रंथो का संपादन कर उन्होंने विविध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी रचनाओ में प्राचीन के प्रति आस्था,इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल राहुल जी थे,जिन्होंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिंतन को पूर्ण रूप से आत्मसात् कर मौलिक दृष्टि देने का प्रयास किया। उनके उपन्यास और कहानियाँ बिल्कुल नए दृष्टिकोण को हमारे सामने रखते हैं। तिब्बत और चीन के यात्रा काल में उन्होंने हजारों ग्रंथों का उद्धार किया और उनके सम्पादन और प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त किया, ये ग्रन्थ पटना संग्रहालय में है। यात्रा साहित्य में महत्वपूर्ण लेखक राहुल जी रहे है । उनके यात्रा वृतांत में यात्रा में आने वाली कठिनाइयों के साथ उस जगह की प्राकृतिक सम्पदा ,उसका आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन और इतिहास अन्वेषण का तत्व समाहित होता है। "किन्नर देश की ओर" ,"कुमाऊ" ,"दार्जिलिंग परिचय" तथा "यात्रा के पन्ने" उनके ऐसे ही ग्रन्थ है।

फोटो में बाएँ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, दायें महापंडित राहुल सांकृत्यायन।
राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है। उन्होंने कहा भी था कि- "कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।" राहुल ने अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात् करते हुए ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ भी रचा। वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वह बागी हो गया। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। वेदान्त के अध्ययन के पश्चात जब उन्होंने मंदिरों में बलि चढ़ाने की परम्परा के विरूद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के सनातनी पुरोहित उन पर लाठी लेकर टूट पड़े। बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद वह इसके ‘पुनर्जन्मवाद’ को नहीं स्वीकार पाए। बाद में जब वे मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुए तो उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में घुसे सत्तालोलुप सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की और उन्हें आन्दोलन के नष्ट होने का कारण बताया। सन् १९४७ में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छपे भाषण को बोलने से मना कर दिया एवं जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजन पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा, पर उनके तेवर फिर भी नहीं बदले। इस कालावधि में वे किसी बंदिश से परे प्रगतिशील लेखन के सरोकारों और तत्कालीन प्रश्नों से लगातार जुड़े रहे। इस बीच मार्क्सवादी विचारधारा को उन्होंने भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर दिया। अपनी पुस्तक ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ एवं ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में इस सम्बन्ध में उन्होंने सम्यक् प्रकाश डाला। अन्तत: सन् १९५३-५४ के दौरान पुन: एक बार वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनाये गये।
एक कर्मयोगी योद्धा की तरह राहुल सांकृत्यायन ने बिहार के किसान-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। सन् १९४० के दौरान किसान-आन्दोलन के सिलसिले में उन्हें एक वर्ष की जेल हुई तो देवली कैम्प के इस जेल-प्रवास के दौरान उन्होंने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ ग्रन्थ की रचना कर डाली। १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन के पश्चात् जेल से निकलने पर किसान आन्दोलन के उस समय के शीर्ष नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्र ‘हुंकार’ का उन्हें सम्पादक बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतु ‘गुण्डों से लड़िए’ शीर्षक से एक विज्ञापन जारी किया। इसमें एक व्यक्ति गाँधी टोपी व जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था। राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इन्कार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानन्द ने इसे छापने पर जोर दिया। अन्तत: राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन से ही अलग कर लिया। इसी प्रकार सन् १९४० में ‘बिहार प्रान्तीय किसान सभा’ के अध्यक्ष रूप में जमींदारों के आतंक की परवाह किए बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतर हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे। प्रतिरोध स्वरूप जमींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार कर लहुलुहान कर दिया पर वे हिम्मत नहीं हारे। इसी तरह न जाने कितनी बार उन्होंने जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया और अपनी आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी।
अध्ययन-अनुसंधान की विभा के साथ वे वहाँ से प्रभूत सामग्री लेकर लौटे, जिसके कारण हिन्दी भाषा एवं साहित्य की इतिहास संबंधी कई पूर्व निर्धारित मान्यताओं एवं निष्कर्षों में परिवर्तन होना अनिवार्य हो गया। साथ ही शोध एवं अध्ययन के नए क्षितिज खुले।
भारत के संदर्भ में उनका यह काम किसी ह्वेनसांग से कम नहीं आँका जा सकता। बाह्य यात्राओं की तरह इन निबंधों में उनकी एक वैचारिक यात्रा की ओर भी संकेत किया गया है, जो पारिवारिक स्तर पर स्वीकृत वैष्णव मत से शुरू हो, आर्य समाज एवं बौद्ध मतवाद से गुजरती हुई मार्क्सवाद पर जाकर खत्म होती है। अनात्मवाद, बुद्ध का जनतंत्र में विश्वास तथा व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध जैसी कुछेक ऐसी समान बातें हैं, जिनके कारण वे बौद्ध दर्शन एवं मार्क्सवाद दोनों को साथ लेकर चले थे।
राष्ट्र के लिए एक राष्ट्र भाषा के वे प्रबल हिमायती थे। बिना भाषा के राष्ट्र गूँगा है, ऐसा उनका मानना था। वे राष्ट्रभाषा तथा जनपदीय भाषाओं के विकास व उन्नति में किसी प्रकार का विरोध नहीं देखते थे।
समय का प्रताप कहें या 'मार्क्सवादी के रूप में उनके मरने की इच्छा' कहें, उन्होंने इस आयातित विचार को सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान 'परमब्रह्म' मान लिया और इस झोंक में वे भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, इतिहास आदि के बारे में कुछ ऐसी बातें कह बैठे या निष्कर्ष निकाल बैठे, जो उनकी आलोचना का कारण बने।
उनकी भारत की जातीय-संस्कृति संबंधी मान्यता, उर्दू को हिन्दी (खड़ी बोली हिन्दी) से अलग मानने का विचार तथा आर्यों से 'वोल्गा से गंगा' की ओर कराई गई यात्रा के पीछे रहने वाली उनकी धारणा का डॉक्टर रामविलास शर्मा ने तर्कसम्मत खंडन किया है। मत-मतांतर तो चलते रहते हैं, इससे राहुलजी का प्रदेय और महत्व कम नहीं हो जाता।
बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद दोनों का मिलाजुला चिंतन उनके पास था, जिसके आधार पर उन्होंने नए भारत के निर्माण का 'मधुर स्वप्न' सँजोया था, जिसकी झलक हमें उनकी पुस्तक 'बाईसवीं सदी' में भी मिल जाती है। श्री राहुल ने अपने कर्तृत्व से हमें अपनी विरासत का दर्शन कराया तथा उसके प्रति हम सबमें गौरव का भाव जगाया।
उनके शब्दों में- ‘‘समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसके हरेक बर्ताव का सार।’’ यही कारण था कि सारे संसार को अपना घर समझने वाले राहुल सन् १९१० में घर छोड़ने के पश्चात पुन: सन् १९४३ में ही अपने ननिहाल पन्दहा पहुँचे। वस्तुत: बचपन में अपने घुमक्कड़ी स्वभाव के कारण पिताजी से मिली डाँट के पश्चात् उन्होंने प्रण लिया था कि वे अपनी उम्र के पचासवें वर्ष में ही घर में कदम रखेंगे। चूँकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा ननिहाल में ही हुआ था सो ननिहाल के प्रति ज्यादा स्नेह स्वाभाविक था। बहरहाल जब वे पन्दहा पहुँचे तो कोई उन्हें पहचान न सका पर अन्तत: लोहार नामक एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें पहचाना और स्नेहासक्ति रूधे कण्ठ से ‘कुलवन्ती के पूत केदार’ कहकर राहुल को अपनी बाँहों में भर लिया। अपनी जन्मभूमि पर एक बुजुर्ग की परिचित आवाज ने राहुल को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी डायरी में इसका उल्लेख भी किया है- ‘‘लाहौर नाना ने जब यह कहा कि ‘अरे ई जब भागत जाय त भगइया गिरत जाय’ तब मेरे सामने अपना बचपन नाचने लगा। उन दिनों गाँव के बच्चे छोटी पतली धोती भगई पहना करते थे। गाँववासी बड़े बुजुर्गों का यह भाव देखकर मुझे महसूस होने लगा कि तुलसी बाबा ने यह झूठ कहा है कि- "तुलसी तहाँ न जाइये, जहाँ जन्म को ठाँव, भाव भगति को मरम न जाने धरे पाछिलो नाँव।।’’
घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो अप्रैल १९६३ में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और १४ अप्रैल, १९६३ को सत्तर वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।
राहुल बाबा
राहुल जी घुमक्कड़ी के बारे मे कहते हैं:
मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दुख में हो चाहे सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़–फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया। जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव–वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहायी है, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हरगिज नहीं चाहेंगे कि वे खून के रास्ते को पकड़ें। किन्तु घुमक्कड़ों के काफले न आते जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।

प्रस्तुति:
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

Sunday, 3 April 2011

भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलनों को संगठित किया जाना जरूरी है

वर्तमान दौर का भूमि अधिग्रहण मुख्यत: निजी क्षेत्र कि व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कम्पनियों के लिए किया बढ़ाया जा रहा है | किसान को जमीन से ,ग्रामीणों को गावं से उजाड़ा व् विस्थापित किया जा रहा है |कम्पनियों को मालिकाने के साथ स्थापित किया जा रहा है |कम्पनियों के स्वार्थ पूर्ति के लिए कृषि भूमि को हडपने की यह नीति डलहौजी की ह्ड्पो नीति से भी ज्यादा गम्भीर खतरनाक एवं व्यापक है।
कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल के सिंगुर और नंदी ग्राम के किसानो की भूमि का अधिग्रहण ,देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ था |पश्चिम बंगाल की सरकार सिंगूर में टाटा मोटर्स के लिए तथा नंदी ग्राम में एक इंडोनेशिया कम्पनी के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण कर रही थी | उसे बंगाल के आधुनिक औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक बता रही थी |उस अधिग्रहण का व्यापक विरोध हुआ |इसी फलस्वरूप टाटा साहब को अपनी लखटकिया कार का कारखाना गुजरात ले जाना पड़ा |
औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों के हितो में कृषि भूमि का वर्तमान दौर में अधिग्रहण देश के हर प्रान्त में हर क्षेत्र में किया जा रहा है |देश की केन्द्रीय व् प्रांतीय सरकारे पिछले १०-१५ सालो से अधिग्रहण की प्रक्रिया को तेजी के साथ आगे बढाती जा रही है |सत्ता -सरकार में आती जाती रहने वाली सभी राजनीतिक पार्टिया यह काम करती रही है |यह बात दूसरी है की सत्ता से बाहर होने के बाद वे भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानो का साथ देती दिखाई पड़ जाती है |लेकिन असलियत यह है कि वे भूमि अधिग्रहण का विरोध नही करती बल्कि अधिग्रहण के लिए ज्यादा मुआवजा न देने के लिए सत्तासीन पार्टी के विरोध की राजनीति करती है |फिर सत्ता -सरकार में आने पर अधिग्रहण की उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में लग जाती है |
वतमान दौर में भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक एवं औद्योगिक विकास के लिए तथा सशक्त रास्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक बताया जा रहा है |देश में बुनियादी ढाचे के विकास के नाम पर ,४ ,६ , ८ लेन की सडको के लिए भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है |फिर इस सडको के किनारे व्यापारिक प्रतिष्ठानों .आधुनिक आवासों तथा मनोरंजन स्थलों आदि से सुसज्जित टाउनशिप के निर्माण के लिए भी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है |इसके अलवा विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (सेज ) के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण तो १० - १५ साल पहले से ही किया जा रहा है |बताने की जरूरत नही कि,टाउनशिप और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण घोषित और एकदम नग्न रूप में कम्पनियों के हित में किया जा रहा अधिग्रहण है |
इसके अलावा अधिग्रहीत भूमि पर बन रही एक्सप्रेस वे नाम की सडको के निर्माण का ठेका भी बड़ी कम्पनियों के पास ही है |
फिर उन सडको का प्रमुखता से इस्तेमाल भी भारी एवं तेज गति के वाहनों के मालिक व् सेवक ही कर रहे है |फुटपाथियो ,स्किल स्वरों आदि के लिए उसका इस्तेमाल कर पाने की गुंजाइश ही बहुत कम है साफ़ बात है कि सडक निर्माण से लेकर उसके इस्तेमाल तक का सबसे बड़ा लाभ कम्पनियों को ही मिलना है और मिल भी रहा है |
देश के आधुनिक विकास के लिए जमीनों का अधिग्रहण पहले भी किया जाता रहा है |लेकिन २०-२५ साल पहले के भूमि अधिग्रहण में न तो आज जैसी तेजी थी और न ही उसे इतने व्यापक स्तर पर चलाया और बढाया ही जा रहा था फिर उस दौर में गैर कृषिक कार्यो के लिए कृषि भूमि का अधि ग्रहण कम से कम किये जाने की नीति भी आमतौर पर अपनाई व लागू की जा रही थी |इसके अलावा उस दौर के भूमि अधिग्रहण और वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण में एक और भी प्रमुख अन्तरहै |वह यह कि सरकारों द्वारा पहले का भूमि अधिग्रहण मुख्यत: सार्वजनिक कार्यो के लिए ,प्रत्यक्ष रूप में नजर आने वाले जनहित व जनसेवा के कार्यो के लिए किया जा रहा था |परन्तु १९८५ -९० के बाद यह अधिग्रहण मुख्यत:निजी क्षेत्र के औद्योगिक ,व्यापारिक ,कम्पनियों के लिए किया जा रहा है उन्ही के दिशा -निदेश के अनुसार बुनियादी ढाचे का कई लेन कई सडको आदि का विकास विस्तार किया जा रहा है |यह बात दूसरी है कई देशी व विदेशी कम्पनियों के निजी हितो ,स्वार्थो को भी अब सत्ता -सरकार से लेकर प्रचार माध्यमो तक में रास्ट्रीय -हित सावर्जनिक -हित कहा जाने लगा है |इसी तरह से किसानो द्वारा अधिग्रहण का विरोध भी बताया व् प्रचारित किया जा रहा है |जमीने बचाने के लिए किये जा रहे उनके न्याय संगत विरोध व् आन्दोलन को मुख्यत: ज्यादा मुआवजे के लिए किया जा रहा प्रचारित कर उसे कमजोर करने और तोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है
इन्ही प्रचारों के साथ वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण को बढ़ाया जा रहा है |किसानो को जमीनों ,ग्रामवासियों को गाँवो से उजाड़ा व् विस्थापित किया जा रहा है |देशी -विदेशी औद्योगिक ,व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कम्पनियों को जमीन का मालिकाना देने के साथ स्थापित किया जा रहा है |उनके सेवको को आधुनिक साधनों -सुविधाओ के साथ आवासित किया जा रहा है |उसके लिए सरकारे उन्हें हर तरह की छूटे -सुविधाए दी जा रही है |
कम्पनी हित में कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण का दूसरा व अहम पहलू यह भी है की बढ़ते अधिग्रहण के साथ अराजक रूप से बढ़ते शहरीकरण के साथ कृषि भूमि के रकबे में हो रही कमी को उपेक्षित किया जा रहा है |सरकारों द्वारा खाद्यान्नों के उत्पादन वृद्धि दर में आ रही कमी की स्वीकारोक्ति तथा खाद्यान्नों की बढती महंगाई के बावजूद यह उपेक्षा की व बढाई जा रही है |
औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों के बढ़ते लाभों के चलते खेती के बढ़ते रहे संकटो के साथ अब उद्योग व्यापर के बड़े मालिको के स्वार्थपूर्ति के लिए कृषि भूमि को हडपने की नीति अपनाई व लागु की जा रही है |वर्तमान दौर की यह' भूमि हड्पो नीति 'डलहौजी नीति से कंही ज्यादा खतरनाक एवं व्यापक है |यह केवल किसानो का ग्रामवासियों का विस्थापन ही नही बल्कि राष्ट्र की आम जनता को खाद्यान्नों के अभाव में महगाई में और ज्यादा फंसाना भी हैं ,उन्हें भुखमरी झेलने के लिए मजबूर करना भी है|
लिहाज़ा कम्पनी कम्पनी हित में चलाये बढाये जा रहे कृषि भूमि के अधिग्रहण का विरोध किये जाने की आवश्यकता है |
देश -प्रदेश में जगह -जगह किसानो के अधिग्रहण के विरोध व आन्दोलन को समर्थन देने की आवश्यकता है |सभी क्षेत्र के ग्रामीणों व किसानो द्वारा कम्पनियों के हित में किए जा रहे अधिग्रहण के विरोध के लिए आगे आने की आवश्यकता है देश के खाद्यान्न उत्पादन के रकबे के अधिग्रहण के विरोध के लिए खाद्यान्नों की महगाई झेल रहे कृषक हिस्सों को भी आगे आने की आवश्यकता है |
उन वैश्वीकरण नीतियों ,सम्बन्धो के विरोध की आवश्यकता है ,जिसके अंतर्गत किसानो व कृषि क्षेत्र के संकटो को तेजी से बढ़ते जाने के साथ अब कृषि भूमि के हडप लेने की प्रक्रिया को भी बढ़ाया जा रहा है |
भूमि अधिग्रहण के लिए इस तर्क का सहारा लेना कत्तई गलत है कि सरकार ही जमीन की वास्तविक मालिक है |इसलिए वह इसका अधिग्रहण जब चाहे कर सकती है |
यह कहना सरकारों द्वारा व्यापक किसानो ,ग्रामीणों ,की उपेक्षा को गावं व जमीन से अन्यायपूर्ण बेदखली को न्याय संगत ठहराना है |अधिग्रहीत भूमि का कम्पनियों को किया जा रहा अन्यायपूर्ण हस्तांतरण को उचित ठहराना है |
सही बात तो यह है कि भूमि अधिग्रहण का मौजूदा दौर और उस पर गढ़े जाने वाले उपरोक्त तर्क भी इसबात की पुष्टि करते है ,देश की सत्ता सरकारे भले ही अपने आप को जनतान्त्रिक सरकारे कहती है ,लेकिन उनका असली काम कम्पनी राज व सरकारे करती है , लेकिन उनका असली काम क्म्पब्नी राज व सरकार का ही है इसका सबूत उन तमाम कानूनों में ,भूमि अधिग्रहण कानून (१८९४ )में भी देखा जा सकता है ,जिसे ब्रिटिश सत्ता के काल में बने कानूनों का वर्तमान राज व सरकार द्वारा संचालन ,उसके स्वतंत्र राज व जनतान्त्रिक राज होने का नही ,अपितु कम्पनी राज होने का सबूत है |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672